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चंपारण सत्याग्रह के सूत्रधार तथा गांधीजी को मोहन से महात्मा बनाने वाले महान स्वतंत्रता सेनानी पं.राजकुमार शुक्ल ने की थी देश की आजादी के लिए सर्वस्व न्यौछावर, आज उनकी 150 वीं जयंती समारोह पर विशेष आलेख

Bihar News : Nawada : 1857 की क्रांति के बाद भारत भूमि पर ब्रह्मभट्ट ब्राम्हण कुल में एक ऐसे व्यक्ति ने जन्म लिया, जिन्होंने भारत की आजादी के भावी आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार की और अपने जीते जी देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया. 

ब्रह्मभट्ट ब्राम्हण कुल विभूति पंडित राजकुमार शुक्ल जी का जन्म 23 अगस्त 1875 को बिहार के चंपारण के मुरली भरहवा गांव में हुआ. वे संपन्न परिवार से थे, जिनका परिवार खेतीबाड़ी से सम्पन्न साहूकार परिवार कहलाता था. चंपारण का क्षेत्र नील की खेती के लिए प्रसिद्ध था, किंतु यही नील की खेती चंपारण और उसकी जमीन तथा किसानों के लिए एक दुखद अनुभव के रूप में थी.

नील की खेती मिट्टी की उर्वरता को नष्ट कर देती थी, जिसके कारण जमीन बंजर होकर जीवन पोषक अन्न और अन्य खाद्य फसलों के योग्य नहीं रह जाती थी. सनातन धर्म के अनुसार भी नील की खेती को अभिशाप माना जाता था, जिसके छींटे वस्त्र और शरीर पर गिरने से धर्म भ्रष्ट हो जाता था. मुगल काल में सिर काटने के बाद भी धड़ लड़ने पर उस पर नील के छींटे मारे जाते थे, जिससे रण में लड़ता धड़ निढ़ाल हो जाता था, ऐसे सैकड़ों उदाहरण वीरभूमि राजस्थान के पांच सौ साल के इतिहास के पन्ने पन्ने पर दर्ज है.

 अंग्रेजों के भारत पर कब्जे के बाद नील के शौकीन अंग्रेजों ने चंपारण के किसानों को इसकी खेती के लिए मजबूर किया, उन्हें प्रताड़ित किया और बहुत सस्ते दामों में खरीद कर किसानों को दुर्दशा में धकेल दिया. संपन्न होते हुए भी पंडित राजकुमार शुक्ल जी के लिए अपने ही भारतीय किसान भाईयों की यह दुर्दशा न देखी गई और उन्होंने इससे पार पाने के प्रयास किए.

इन्हीं प्रयासों में उन्हें अफ्रीका में सत्याग्रह कर चुके महात्मा गांधी में वह आशा की किरण दिखाई दी, जो नील के किसानों और धरती की दुर्दशा  को दूर कर सकते थे. शुक्ल जी गांधी जी से मिलने, उन्हें चंपारण लाने और नील की खेती के विरुद्ध सत्याग्रह के लिए उद्यत हुए.

पंडित राजकुमार शुक्ल जी ही वह व्यक्ति थे, जिन्होंने महात्मा गांधी को चंपारण आने के लिए राजी किया, जिसके कारण बाद में चंपारण सत्याग्रह हुआ. 1916 में लखनऊ में कांग्रेस के 31 वें सत्र के दौरान गांधीजी चंपारण के किसानों के प्रतिनिधि राज कुमार शुक्ल जी से मिले, जिन्होंने उनसे अनुरोध किया कि वे स्वयं आकर वहां के नील के किसानों की दुर्दशा देखें. 

गांधीजी ने बाद में अपनी आत्मकथा में लिखा, "मुझे स्वीकार करना चाहिए कि तब मुझे चंपारण का नाम भी नहीं पता था, भौगोलिक स्थिति तो दूर की बात थी, और मुझे नील के बागानों की भी शायद ही कोई जानकारी थी." [ उद्धरण वांछित ] इस प्रकार शुक्ल जी ने गांधी जी से मुलाकात कर उन्हें चंपारण के किसानों की दुर्दशा से अवगत कराया और उन्हें वहां आने के लिए राजी किया. 

वह क्षेत्र के जाने-माने नील किसान थे, इसकी वहां के अखबारों में भरपूर चर्चा हुई, जिससे आंदोलन को जनता का खूब साथ मिला. इसका परिणाम यह हुआ कि अंग्रेजी सरकार को झुकना पड़ा. इस तरह यहां पिछले 135 वर्षों से चली आ रही नील की खेती धीरे-धीरे बंद हो गयी. साथ ही किसानों का  शोषण भी हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो गया.

बाद में गांधी जी विश्व के बड़े नेता बन कर उभरे. चंपारण में ही उन्होंने यह भी तय किया कि वे आगे से सिर्फ एक कपड़े पर ही गुजर-बसर करेंगे. इसी आंदोलन के बाद उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि से विभूषित किया गया. गांधी जी को चंपारण लाने और सत्याग्रह आंदोलन को सफल बनाने में पंडित राजकुमार शुक्ल जी की अहम भूमिका रही. 

आंदोलन में अपनी जमीन-जायदाद सबकुछ न्यौछावर करने वाले शुक्ल जी के बाकी के दिन गरीबी में बीते और अपना काम पूरा करने के बाद शुक्ल जी 20 मई, 1929 को दुनिया छोड़ गये. आज उनकी जन्मतिथि के पावन अवसर पर ब्रह्मभट्ट ब्राम्हण कुल के महान स्वतंत्रता सेनानी, गांधी जी को महात्मा बनाने और विश्व पटल पर स्थापित करने में अहम भूमिका निभाने वाले भारत माता के सत्याग्रही सपूत को उनकी 150 वीं जयंती पर सादर वंदन, नमन करते हैं. 

पंडित राजकुमार शुक्ल जी को भारत सरकार द्वारा भारतरत्न से सम्मानित किया जाना बिहार वासियों की पुरानी मांग रही है. ऐसे महान विभूति को सम्मान मिलने का अर्थ है, राष्ट्र को सम्मान मिलना.

(आलेख - विष्णु चरण भट्ट, कांकरोली, राजसमन्द, राज.)

                                              - चंद्रमौलि शर्मा.

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